Sunday, 27 May 2018

कितना खारा है समन्दर ये नदी से पूछ लो।
कितना भीगा है मेरा मन जिन्दगी से पूछ लो।

मन हमारा पढ़ सकोगे तब समझ आऊँगी मैं,
जल्दबाजी हो तो खुद की आशिकी से पूछ लो।

देह की इस कोठरी में कैद है सालों से जान,
भ्रमर से क्या पूछते हो पाँखुरी से पूछ लो।

धूप सिमटी जा रही है बढ़ रही परछाइयाँ,
क्या है तेरे कद की कीमत तिश्नगी से पूछ लो।

मेरे ख्वाबों को गुनाहों में गिना करते है लोग,
क्या सजा देनी है मुझको ये खुदी से पूछ लो।

#आस्था
भगवान तुझे लेकर के एक रोज़ जमीं पर आऊँ।
तू मुझको खुद में खोजे मैं तुझे नजर न आऊँ।

तेरी हर एक नादानी का मैं कच्चा चिट्ठा खोलूँ,
तू मुँह से कुछ न बोले मैं तुझको खूब सुनाऊँ।

तेरी कोरी मस्त नजर में सपनों का सुरमा भर दूँ,
फिर नींद तेरी गायब कर तुझे सारी रात जगाऊँ।

कभी प्यार कभी नादानी कभी रूठूँ कभी मनाऊँ
तुझे एक जगह बैठा कर जीवन का गणित पढ़ाऊँ।

मौसम में धुन्ध जमा है या आँखे बन्द हैं तेरी,
कुछ दिन की छुट्टी ले तू तेरी दुनियाँ तूझे दिखाऊँ।

#आस्था

Thursday, 7 December 2017

इश्क़

क्या है इश्क़?
ख़ूबसूरती के सम्मोहन में बंधी हुई नजरें या फूल के इर्द गिर्द मंडराते हुए भंवरे, या फिर खुशबू के आकर्षण में बंधा हुआ मन।

नहीं ये इश्क़ नहीं हो सकता।

इश्क़ तो फूल के साथ अडिग उस कांटे की तरह है जिस पर फूल की उम्र, रंगत और खुशबू का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हर मौसम में, हर हाल में, फूल के खिलने से लेकर मुरझाने तक साथ होता है। कांटा उस जीवनसाथी की तरह होता है जो हमेशा साथ निभाने का संकल्प लेता है, किसी भी हाल में किसी भी परिस्थि में, और साथ निभाता भी है। कांटा चुभता तो है पर उसकि ऊँगली में जो फूल को छूने की कोशिस करता है या यूँ कहें उसके इश्क़ को छूने की कोशिस करता है।

अब कोई जा के बताए उन भवरों को जो बेवजह, बेमतलब भटक रहे हैं कि फूलों ने भवरों को चुनना छोड़ दिया। वो खुश हैं अपने अडिग और शाश्वत इश्क़ के साथ।

#आस्था

Monday, 4 December 2017

अनसुलझा

तुम्हें उगना नहीं आया।
हमें बोना नहीं आया।
बड़े खुदगर्ज रिश्ते थे
हमें ढोना नहीं आया।

कभी महका कभी बहका
तुम्हारी याद का दरिया
कभी उलझा कभी सुलझा
तुम्हारे प्यार का जरिया
वो रातें थी अधूरी सी
वो बातें थी अधूरी सी
तुम्हें पाना नही आया
हमें खोना नहीं आया।

गुलों ने शाख बदली है
लबों ने प्यास बदली है
किसी का साथ छूटा है
किसी का ख्वाब टूटा है
उजालों में अन्धेरे हैं
दिलों में जख्म गहरे हैं
तुम्हें हँसना नहीं आया
हमें रोना नहीं आया।

#आस्था

Sunday, 3 December 2017

मैं और आप

भगवान तुझे लेकर के एक रोज़ जमीं पर आऊँ।
तू मुझको खुद में खोजे मैं तुझे नजर न आऊँ।

तेरी हर एक नादानी का मैं कच्चा चिट्ठा खोलूँ,
तू मुँह से कुछ न बोले मैं तुझको खूब सुनाऊँ।

तेरी कोरी मस्त नजर में सपनों का सुरमा भर दूँ,
फिर नींद तेरी गायब कर तुझे सारी रात जगाऊँ।

कभी प्यार कभी नादानी कभी रूठूँ कभी मनाऊँ,
तुझे एक जगह बैठा कर जीवन का गणित पढ़ाऊँ।

मौसम में धुन्ध जमा है या आँखे बन्द हैं तेरी,
कुछ दिन की छुट्टी ले तू तेरी दुनियाँ तूझे दिखाऊँ।

#आस्था

Tuesday, 7 November 2017

जहाँ मेरी जरूरत नहीं होती है वहाँ मैं नहीं होती हूँ। मैं कहीं भी सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए नहीं जा सकती। आप क्या है, आप कौन हैं या की आप क्या कर सकते हैं मुझे फर्क ही नहीं पड़ता। मैं बहुत महत्वपूर्ण हूँ अपने लिए और अपनों के लिए। और ये महत्व मैं किसी के लिए भी कम नहीं कर सकती। स्वाभिमानी हूँ, आप अभिमानी बोल सकते हैं।

#आस्था

Thursday, 2 November 2017

कुछ दिल से

देह के चंदन पटल पर, दंश करती हैं निगाहें।
मौन है मन के उजाले, रात गढ़ती हैं कथायें।

प्यार का कैसा चरण है, या अधूरा व्याकरण है,
स्वप्न की अर्थी सजा के, फूल चुनती हैं विधायें।

रुक्मिणी है बन्धनों में, राधिका की चाहतें हैं,
रक्त में घुलता जहर है, मंद रोती हैं शिरायें।

तोड़ कर सारे किनारे, चल पड़ी किस ओर धारा
चाह के अतृप्त वन में, नृत्य करतीं हैं हवायें।

धर्म के गंगा कलश पर, कण्ठ जकड़ें रीतियाँ हैं,
और अन्धी चाहतों में, वेद लिखती हैं प्रथायें।

#आस्था