कितना खारा है समन्दर ये नदी से पूछ लो।
कितना भीगा है मेरा मन जिन्दगी से पूछ लो।
मन हमारा पढ़ सकोगे तब समझ आऊँगी मैं,
जल्दबाजी हो तो खुद की आशिकी से पूछ लो।
देह की इस कोठरी में कैद है सालों से जान,
भ्रमर से क्या पूछते हो पाँखुरी से पूछ लो।
धूप सिमटी जा रही है बढ़ रही परछाइयाँ,
क्या है तेरे कद की कीमत तिश्नगी से पूछ लो।
मेरे ख्वाबों को गुनाहों में गिना करते है लोग,
क्या सजा देनी है मुझको ये खुदी से पूछ लो।
#आस्था
कितना भीगा है मेरा मन जिन्दगी से पूछ लो।
मन हमारा पढ़ सकोगे तब समझ आऊँगी मैं,
जल्दबाजी हो तो खुद की आशिकी से पूछ लो।
देह की इस कोठरी में कैद है सालों से जान,
भ्रमर से क्या पूछते हो पाँखुरी से पूछ लो।
धूप सिमटी जा रही है बढ़ रही परछाइयाँ,
क्या है तेरे कद की कीमत तिश्नगी से पूछ लो।
मेरे ख्वाबों को गुनाहों में गिना करते है लोग,
क्या सजा देनी है मुझको ये खुदी से पूछ लो।
#आस्था