देह के चंदन पटल पर, दंश करती हैं निगाहें।
मौन है मन के उजाले, रात गढ़ती हैं कथायें।
प्यार का कैसा चरण है, या अधूरा व्याकरण है,
स्वप्न की अर्थी सजा के, फूल चुनती हैं विधायें।
रुक्मिणी है बन्धनों में, राधिका की चाहतें हैं,
रक्त में घुलता जहर है, मंद रोती हैं शिरायें।
तोड़ कर सारे किनारे, चल पड़ी किस ओर धारा
चाह के अतृप्त वन में, नृत्य करतीं हैं हवायें।
धर्म के गंगा कलश पर, कण्ठ जकड़ें रीतियाँ हैं,
और अन्धी चाहतों में, वेद लिखती हैं प्रथायें।
#आस्था
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