Monday, 4 December 2017

अनसुलझा

तुम्हें उगना नहीं आया।
हमें बोना नहीं आया।
बड़े खुदगर्ज रिश्ते थे
हमें ढोना नहीं आया।

कभी महका कभी बहका
तुम्हारी याद का दरिया
कभी उलझा कभी सुलझा
तुम्हारे प्यार का जरिया
वो रातें थी अधूरी सी
वो बातें थी अधूरी सी
तुम्हें पाना नही आया
हमें खोना नहीं आया।

गुलों ने शाख बदली है
लबों ने प्यास बदली है
किसी का साथ छूटा है
किसी का ख्वाब टूटा है
उजालों में अन्धेरे हैं
दिलों में जख्म गहरे हैं
तुम्हें हँसना नहीं आया
हमें रोना नहीं आया।

#आस्था

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