Sunday, 27 May 2018

कितना खारा है समन्दर ये नदी से पूछ लो।
कितना भीगा है मेरा मन जिन्दगी से पूछ लो।

मन हमारा पढ़ सकोगे तब समझ आऊँगी मैं,
जल्दबाजी हो तो खुद की आशिकी से पूछ लो।

देह की इस कोठरी में कैद है सालों से जान,
भ्रमर से क्या पूछते हो पाँखुरी से पूछ लो।

धूप सिमटी जा रही है बढ़ रही परछाइयाँ,
क्या है तेरे कद की कीमत तिश्नगी से पूछ लो।

मेरे ख्वाबों को गुनाहों में गिना करते है लोग,
क्या सजा देनी है मुझको ये खुदी से पूछ लो।

#आस्था
भगवान तुझे लेकर के एक रोज़ जमीं पर आऊँ।
तू मुझको खुद में खोजे मैं तुझे नजर न आऊँ।

तेरी हर एक नादानी का मैं कच्चा चिट्ठा खोलूँ,
तू मुँह से कुछ न बोले मैं तुझको खूब सुनाऊँ।

तेरी कोरी मस्त नजर में सपनों का सुरमा भर दूँ,
फिर नींद तेरी गायब कर तुझे सारी रात जगाऊँ।

कभी प्यार कभी नादानी कभी रूठूँ कभी मनाऊँ
तुझे एक जगह बैठा कर जीवन का गणित पढ़ाऊँ।

मौसम में धुन्ध जमा है या आँखे बन्द हैं तेरी,
कुछ दिन की छुट्टी ले तू तेरी दुनियाँ तूझे दिखाऊँ।

#आस्था