Tuesday, 7 November 2017

जहाँ मेरी जरूरत नहीं होती है वहाँ मैं नहीं होती हूँ। मैं कहीं भी सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए नहीं जा सकती। आप क्या है, आप कौन हैं या की आप क्या कर सकते हैं मुझे फर्क ही नहीं पड़ता। मैं बहुत महत्वपूर्ण हूँ अपने लिए और अपनों के लिए। और ये महत्व मैं किसी के लिए भी कम नहीं कर सकती। स्वाभिमानी हूँ, आप अभिमानी बोल सकते हैं।

#आस्था

Thursday, 2 November 2017

कुछ दिल से

देह के चंदन पटल पर, दंश करती हैं निगाहें।
मौन है मन के उजाले, रात गढ़ती हैं कथायें।

प्यार का कैसा चरण है, या अधूरा व्याकरण है,
स्वप्न की अर्थी सजा के, फूल चुनती हैं विधायें।

रुक्मिणी है बन्धनों में, राधिका की चाहतें हैं,
रक्त में घुलता जहर है, मंद रोती हैं शिरायें।

तोड़ कर सारे किनारे, चल पड़ी किस ओर धारा
चाह के अतृप्त वन में, नृत्य करतीं हैं हवायें।

धर्म के गंगा कलश पर, कण्ठ जकड़ें रीतियाँ हैं,
और अन्धी चाहतों में, वेद लिखती हैं प्रथायें।

#आस्था